आध्यात्मिक होने का तात्पर्य साधु या बाबा हो जाना नहीं है !

मानव धर्म के प्रति आस्था रखना, आध्यात्मिक विचारधारा को अपनाना, आध्यात्मिक होने का तात्पर्य साधु या बाबा हो जाना नहीं है वरन मानवता व मानवीयता को एक-दूसरे के प्रति जागृत करना है साथ ही साथ जो यह सोचते हैं या सोच रहे हैं कि वे यदि मानव धर्म के प्रति आस्था रखेंगे तो वे साधु या बाबा बन जायेंगे यह पूर्णत: गलत है।

मानव धर्म पूर्णत: एक मानव को दूसरे मानव के प्रति संवेदनशील होने व प्रेम करने की शिक्षा देता है इस संवेदना को जागृत करने के लिये किसी चोला को धारण करने की आवश्यकता नहीं है वरन आप जिस रूप में हैं उसी रूप में रहते हुये मानवीय आस्था जागृत कर सकते हैं तथा मानवता का आदर्श प्रस्तुत कर सकते हैं।

आज सर्वाधिक आवश्यकता मानवता व मानवीय द्रष्ट्रिकोण की है, एक-दूसरे के प्रति समर्पण भाव, निस्वार्थ प्रेम व सहयोग की है, कोई अपना-पराया नहीं है, हम सब एक हैं, यह ही मानव धर्म है।
जय गुरुदेव

आचार्य उदय

5 comments:

Arvind Mishra said...

सत्य वचन महराज

उठा पटक said...

धन्य है आचार्य जी आपकी मानव धर्म रूपी माया नगरी, मै शत शत नमन करता हूं!

ajit gupta said...

आध्‍यात्‍म का अर्थ है - आत्‍मनिअधि अर्थात अपने अंदर। हम अपने अन्‍दर की इन्द्रियों, मन, बुद्धि और आत्‍मा को जानने का जब प्रयास करते है उसे आध्‍यात्‍म कहते हैं। इसलिए यह कतई आवश्‍यक नहीं है कि इसके लिए संन्‍यासी बना जाए। जिस प्रकार एक गृहस्‍थ अपनी गृहस्‍थी में डूबा रहता है उसी प्रकार आज का संन्‍यासी अपने कर्म-काण्‍डों में डूबा रहता है। उसकी आत्‍मा परमात्‍मा से बनी है और दुनिया के प्रत्‍येक जीव में उसी तरह एक आत्‍मा है यह ज्ञान वह कर ही नहीं पाता अपितु कभी साक्षात हिंसा और कभी मानसिक हिंसा करता रहता है।

प्रवीण पाण्डेय said...

मानसिक स्थिति ही अध्यात्म की गहराई निर्धारित करती है।

श्याम कोरी 'उदय' said...

...प्रणाम आचार्य जी !!!