लकीरें

"जो रीति-नीति, धर्म-कर्म, आचार-व्यवहार, इंसानों के बीच में लकीरें खींच दें वह अनुशरण के योग्य नहीं हो सकते।"
आचार्य उदय

9 comments:

ललित शर्मा said...

जय हो आचार्य उदय जी की

प्रवीण पाण्डेय said...

सच है । समग्रता संयोजन में है ।

संगीता पुरी said...

आभार !!

arvind said...

जय हो

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

अमृत वचनों की बारिश में भिगोने का शुक्रिया।
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किसने कहा पढ़े-लिखे ज़्यादा समझदार होते हैं?

शिक्षामित्र said...

अधिक चिंताजनक यह है कि जो यह संदेश देते हैं,समय आने पर स्वयं वे भी वही सब करते हैं(नोटःकृपया इसे व्यक्तिगत टिप्पणी न माना जाए)।

दिगम्बर नासवा said...

अती उत्तम विचार ...

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश, सम्पादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक), जयपुर (राजस्थान) और राष्ट्रीय अध्यक्ष-बास/ Dr. Purushottam Meena Nirankush, Editor PRESSPALIKA,(Fortnightly) Jaipur, Raj. and N. P.-BAAS said...

भारत में तो मनुवाद पर आधारित हिन्दू धर्म या ब्राह्मणवादी धर्म ने ही यह कुकृत्य हजारों वर्ष तक किया है। आज भी जारी है! क्या कहना आपका?-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश, सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र) एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) (जो दिल्ली से देश के सत्रह राज्यों में संचालित है। इस संगठन ने आज तक किसी गैर-सदस्य, या सरकार या अन्य बाहरी किसी भी व्यक्ति से एक पैसा भी अनुदान ग्रहण नहीं किया है। इसमें वर्तमान में ४३४२ आजीवन रजिस्टर्ड कार्यकर्ता सेवारत हैं।)। फोन : ०१४१-२२२२२२५ (सायं : ७ से ८) मो. ०९८२८५-०२६६६

विनोद कुमार पांडेय said...

सत्यवचन..अनुकरणीय