Showing posts with label आचार्य जी. Show all posts
Showing posts with label आचार्य जी. Show all posts

मैं कौन हूं !

मैं कौन हूं, आप सभी के मन की जिज्ञासा है यह जानने की, कि मैं कौन हूं, तो चलिये कोशिश कीजिये मुझे पहचानने की ... मैं एक आम साधारण या असाधारण इंसान हूं, मुझे देख कर कोई यह नहीं कह सकता कि ये फ़ला धर्म का व्यक्ति है ...

... कोई यह नहीं कह सकता कि इसने माथे पर टीका लगाया है इसलिये यह हिन्दू है ... और कोई यह भी नहीं कह सकता कि इसने ऎसी टोपी पहन रखी है जिसे देख कर कोई यह अनुमान लगाये कि यह मुसलमान है ... हां मैंने गले में कोई क्रास का प्रतीक भी नहीं पहना हुआ है जिसे देखकर कोई यह कहे कि यह तो ईसाई है ...

... आप सचमुच मुझे जानना चाहते हैं, पहचानना चाहते हैं तो आगे बढो ... आम रास्ते पर, बाजार में, सरकारी व गैर सरकारी कार्यालयों में, धार्मिक स्थलों में ... सभी स्थानों पर मैं हूं ... बस मेरी पहचान एक आम इंसान की है, मेरा कोई सांकेतिक धर्म नहीं है, कोई सांकेतिक जाति नहीं है, कोई सांकेतिक संप्रदाय नहीं है ... देखने में मैं एक साधारण इंसान हूं ...

... मानवता ही मेरा धर्म है, मानवीयता ही मेरी जाति है, मानवीय सोच - विचारधारा - द्रष्ट्रिकोण ही मेरा संप्रदाय है, हां मैं मानव धर्म का समर्थक हूं, अनुयायी हूं, पुजारी हूं ... यही मैं हूं और यही मेरी पहचान है ।

आचार्य जी

मन क्या है !

मन क्या है, मन आत्मा का एक अदभुत स्वरूप है जो हमारे मस्तिष्क में चलायमान अर्थात क्रियाशील है, मन ही शरीर के आंतरिक स्वरूप तथा प्रकृति रूपी बाहरी स्वरूप के बीच की कडी है, जो हमें दोनो रूपों का साक्षात बोध कराता है।

मन ही हमें प्रत्येक वस्तु के महत्व को समझाता है, इच्छाएं जागृत करता है, भ्रम पैदा करता है, लालच जाग्रत करता है, प्रायश्चित कराता है, आत्मा-परमात्मा की ओर जाने का मार्ग प्रशस्त करता है और जब आप जाने लगें तो जाने से रोकता भी है।

मन आत्मा, परमात्मा, ईश्वर का अंश है जिसे नियंत्रित करना अर्थात मानव जीवन से मुक्ति प्राप्त करना है, कहने का तात्पर्य यह है कि जब आप मन को जीत लोगो तब आत्मा, परमात्मा, ईश्वर के संपर्क में स्वमेव आ जाओगे, सीधे सरल शब्दों में कहा जाये तो मन एक प्रवेश द्वार है जिसमें प्रवेश कर आप आत्मा, परमात्मा, ईश्वर के दर्शन कर सकते हैं।

मन शक्तिरूपी एक पुंज है जो हर क्षण क्रियाशील रहता है, यदि इस मायावी दुनिया में पाने अर्थात विजय प्राप्त करने की कोई विषय वस्तु है तो वो है मन, मन एक अदभुत शक्ति पुंज है जिस पर विजय सकारात्मक सोच व व्यवहार के द्वारा ही संभव है।

आचार्य जी

मैं कौन हूं !

मैं कौन हूं, मेरा परिचय क्या है, मेरी तस्वीर क्या है, कहां से आया हूं, क्या चाहता हूं, ऎसे बहुत प्रश्न आपके मन में हैं और आप सभी इन प्रश्नों के उत्तर भी जानना चाहते हैं।

मैं एक नश्वर ऊर्जा पुंज हूं, मेरे शब्द व भाव ही मेरा परिचय हैं, जो आप महसूस कर रहे हो एवं महसूस कर सकते हो वह ही मेरी तस्वीर है, न कहीं से आया हूं और न ही कहीं जाना चाहता हूं।

मैं आपके मन में, भावनाओं में, इच्छाओं में, कल्पनाओं में, फ़ूलों की खुशबू में, पवन के झौंके में, अग्नि के ताप में, संभोग की तृप्ति में, प्रकृति की छांव में, बारिश की रिमझिम में, बच्चों की मुस्कान में, युवाओं की चाहत में, बुजुर्गों के आशीर्वाद में ... इन सभी में हूं।

आचार्य जी

प्रतिभाएं ही ईश्वर हैं !

प्रतिभाएं ही ईश्वर हैं !
क्या यह संभव है कि प्रतिभाएं ईश्वर हो सकती हैं, जी हां यह संभव है, इसे प्रमाणित करने हेतु हमें सर्वप्रथम ईश्वर को जानना व समझना होगा, ईश्वर एक शक्ति का नाम है जिसके लिए कुछ भी संभव या असंभव नही है वो जैसा चाहे अपनी इच्छाओं के अनुरुप व्यवस्था बना कर कार्यों को संपादित करती है या दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि जो गतिशील है वह ही ईश्वर की इच्छाएं अथवा व्यवस्थाएं हैं, और भी सरल शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि जो हो रहा है, जो चुका है, जो होने वाला है सब ईश्वर की ही माया है ।

यहां मैं यह भी स्पष्ट करना चाहूंगा कि जो विद्धान ईश्वर को नहीं मानते है अर्थात ईश्वर के अस्तित्व को नकारते हैं मैं उनसे भी सहमत हूं ... वो इसलिये कि वे विद्धान ईश्वर के अस्तित्व को तो नकार देते हैं पर जो हो रहा होता है उसे प्राकृतिक घटनाएं अथवा व्यवस्थाएं मान लेते हैं, अब मैं यहां यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि जो प्राकृतिक है वह ही तो ईश्वर है, हम प्राकृतिक कह लें या ईश्वरीय कह लें दोनों का भाव एक समान है।

प्रतिभाएं (अर्थात प्रतिभाशाली व्यक्तित्व) भी ईश्वर की भांति एक शक्ति पुंज होती हैं जो केन्द्र बिंदु बनकर अपने चारों ओर अपनी इच्छाओं के अनुरुप कार्य संपादित करा लेती हैं, जब किसी प्रतिभा की इच्छाओं व भावनाओं के अनुरुप समय चक्र कार्य संपादित करने लगे तो यह समझ लेना चाहिये कि वह प्रतिभाशाली व्यक्तित्व ही ईश्वर है अथवा उसमें ईश्वर के अंश समाहित हैं जो समय व व्यवस्थाओं को अपने अनुरुप संचालित कर रहे है।


आचार्य जी


क्रोध अग्नि के समान है !

क्रोध अग्नि के समान है, जिस प्रकार अग्नि अपने तेज व प्रभाव से किसी भी वस्तु को जलाकर नष्ट कर देती है ठीक उसी प्रकार क्रोध भी अग्नि के स्वभाव के अनुकूल जलाने व नष्ट करने का कार्य संपादित करता है ।

यह सच है अग्नि के प्रज्वलित होने में आवश्यक सामग्रिओं की आवश्यकता होती है ठीक उसी प्रकार तत्कालीन उपजे हालात क्रोध को जन्म देते हैं, दोनो ही अपने अपने स्वभाव के अनुरूप आस-पास के वातावरण को गर्म कर देते हैं और जो कोई उनके नजदीक आते हैं उन्हें भी तेज का सामना करना पडता है।

अग्नि व क्रोध परिस्थियों के अनुरुप सकारात्मक कार्य भी संपादित करते हैं किंतु इन पर नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है यदि नियंत्रण नही रखा गया तो इनके परिणाम नकारात्मक रहते हैं।

जिस प्रकार अग्नि शनै शनै जलकर शांत होकर राख का रूप ले लेती है ठीक उसी प्रकार क्रोध भी समय के साथ साथ शांत हो जाता है किंतु जब तक ये क्रियाशील रहता हैं तब तक इसके प्रभाव अत्यंत खतरनाक व नकारात्मक बने रहते हैं।

क्रोध एक ऎसी ज्वाला है जो मन मस्तिष्क में जलती है इसलिये यह स्वयं के शरीर के लिये अहितकर होती है जब तक यह शांत नही हो जाती तब तक स्वयं के शरीर को अपने चपेट में रखती है, क्रोध को शांत करना बेहद कठिन कार्य है, आज तक ऎसी कोई साधना या दवा नहीं बनी जो क्रोध को तत्काल शांत कर दे।

क्रोध पर नियंत्रण स्वभाविक व्यवहार से ही संभव है जो साधना से कम नहीं है, सर्वप्रथम तो क्रोध के कारणों को अपने व्यवहारिक जीवन से दूर कीजिये यदि दूर करना संभव न हो तो स्वयं उन हालात से कुछ समय के लिये दूर हो जाईये, इसके पश्चात क्रोध के कारणों पर एक सफ़ल वक्ता की तरह अपने मित्रों के समक्ष भडास निकालते हुये अभिव्यक्त कर दीजिये, निरंतर कुछ दिनों तक भडास निकालते रहिये ... शनै शनै मन शांत होने लगे तब स्वयं समीक्षा करते हुये क्रोध को समूल नष्ट कर दीजिये।

मन की शांति

मन क्यों उदास हो जाता है, मन की इच्छाएं क्यों असीमित हो जाती हैं, मन में लालसाएं व जिज्ञासाएं हर पल क्यों जन्म लेती हैं, क्यों मन की शांति के लिये भटकना पडता है, मन की शांति का उपाय क्या है !!!

मन चंचल है, भूखा-प्यासा है, लालची है, व्याकुल है, अस्थिर है!!!

मन पर नियंत्रण बेहद सरल कार्य है, जैसे ही मन में कोई इच्छा जागृत हो उसे तत्काल शांत कर दीजिये, मन को संदेश दो अभी रुक जाओ एक घंटे के बाद प्रयास करते हैं, चाय पीने की इच्छा जागृत हुई चाय पिओ पर एक घंटे के बाद, धीरे धीरे इस अवधि को बढाते जाईये ... आपका मन स्वमेव शांत होने लगेगा!!!!!